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अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील, विशेष दयालु है। अल्लाह तआला हमारे आका मुहम्मद, उनकी आल और उनके सहाबा पर दरूद व सलाम नाज़िल फ़रमाए। ऐ अल्लाह! तेरे नबी, हमारे आका मुहम्मद (उन पर शांति हो) की उस प्रतिष्ठा के वसीले से जो उनके लिए तेरे पास है, और उस मुहब्बत के वसीले से जो तू उनसे करता है और वे तुझसे करते हैं, और उस रहस्य के वसीले से जो तेरे और उनके बीच है, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू उन पर, उनकी आल और उनके सहाबा पर दरूद व सलाम नाज़िल फ़रमा। मेरे दिल में उनकी मुहब्बत को कई गुना बढ़ा दे। उनके सदक़े और उनके ऊँचे मक़ामात के वसीले से मुझे उनकी सच्ची पहचान अता कर। उनके तरीक़े पर चलने, उनके अदब और उनकी सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। इस पर मुझे दृढ़ता प्रदान कर। मुझे इज़्ज़त दे कि मैं रसूल (उन पर शांति हो) का दीदार कर सकूँ। मुझे खुश कर कि मैं उनसे हमकलाम हो सकूँ। मुश्किलों, रुकावटों, वसीलों और पर्दों को दूर कर दे। मेरे कानों को उनके मीठे ख़िताब से हिस्सा दे। ऐ अल्लाह! मुझे रसूल (उन पर शांति हो) के इल्म और मारिफ़त से लाभ उठाने की इजाज़त दे… उन पर मेरी सलात को ऐसा मुकम्मल, पाक, चमकदार नूर बना दे जो हर ज़ुल्म, अंधेरा, शक, शिर्क, कुफ्र, बातिल और गुनाह को मिटा दे। और उस सलात को मेरे तज़किये का कारण बना दे। इन बरकतों के ज़रिये मुझे इख़लास के मक़ाम की बुलंदी तक पहुँचा दे, ताकि मेरे भीतर कोई संदेह न रहे कि इबादत केवल तेरे सिवा किसी और के लिए नहीं। इस तरह मुझे अपने हुज़ूर का योग्य बना और मुझे अपने क़रीबी दोस्तों में शामिल कर। मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं यह सब करते हुए हमेशा रसूल (उन पर शांति हो) के अदब और सुन्नत को मज़बूती से थामे रहूँ और उनकी नूरानी शख़्सियत से मदद चाहता रहूँ। ऐ अल्लाह! ऐ नूर! ऐ हक़! ऐ ज़ाहिर! ऐ अल्लाह! ऐ नूर! ऐ हक़! ऐ ज़ाहिर! ऐ अल्लाह! ऐ नूर! ऐ हक़! ऐ ज़ाहिर!
ऐ अल्लाह! अपने बंदे, अपने रसूल, उम्मी नबी—हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर ऐसा दरूद नाज़िल फ़रमा जो उनके बदले के तौर पर तेरी रज़ा को हासिल कर दे। उन्हें अल-वसीला का मक़ाम, वह मक़ाम-ए-महमूद जो तूने वादा किया है, और फ़ज़ीलत अता फ़रमा। हमारी तरफ़ से, उनके लायक़, उन्हें उसी सबसे बेहतरीन बदले से बदला दे जिससे तूने किसी नबी को अपनी क़ौम की तरफ़ से और किसी रसूल को अपनी उम्मत की तरफ़ से बदला दिया है। ऐ रहम करने वालों में सबसे रहम करने वाले! नबियों और सालिहीन में से उनके तमाम भाइयों पर भी दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद—ख़ैर के पेशवा, बरकतों के फातेह, रहमत के नबी और इस उम्मत के आका; अल्लाह के रसूल, रब्बुल-आलमीन के रसूल और रसूलों के सरदार—पर अपनी सलावतों में से सबसे अफ़ज़ल, बढ़ती रहने वाली फ़ायदों में से सबसे शरीफ़, बरकतों की बढ़ोतरी, अपनी शफ़क़त, रहमत और करम से निकलने वाले एहसान, और तरह-तरह की नेमतों में से सबसे अफ़ज़ल इनाम अता फ़रमा।
ऐ अल्लाह! उन्हें उस मक़ाम-ए-महमूद तक पहुँचा दे जिस पर पहले और बाद वाले ग़بطा करेंगे; जो उन्हें राज़ी करेगा और तुझसे उनकी क़ुरबत बढ़ाएगा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद को फ़ज़्ल, फ़ज़ीलत, शरफ़, जन्नत का सबसे ऊँचा मक़ाम अल-वसीला, और दर्जों व मक़ामात में सबसे बुलंद दर्जा अता फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद को अल-वसीला का मक़ाम अता फ़रमा, उनकी तमन्नाएँ पूरी कर, और उन्हें पहला शफ़ाअत करने वाला और पहला जिसकी शफ़ाअत कबूल हो, बना दे।
ऐ अल्लाह! उनकी नुबूवत पर दलील देने वाली निशानियाँ अज़ीम कर दे। उनका मीज़ान भारी कर दे। उनकी हुज्जत को रौशन कर दे। सातवें आसमान में मुक़र्रब फ़रिश्तों, नबियों, शहीदों, औलिया और उलमा की रूहें जहाँ जमा होती हैं, उन ऊँचे मक़ाम वालों में उनका दर्जा बुलंद कर दे। और उनका मक़ाम मुक़र्रबून के मक़ाम से भी ऊपर उठा दे।
ऐ अल्लाह! हमें उनकी सुन्नत से ज़िंदा कर। हमें उनके दीन पर ज़िन्दगी गुज़ारते हुए मौत दे। हमें उन लोगों में से कर दे जो उनकी शफ़ाअत पाते हैं। हमें उनकी जमाअत में हश्र कर। हमें हौज़-ए-कौसर तक पहुँचा। उसके प्यालों से हमें इस तरह पिला कि हमारे ऐब ज़ाहिर न हों। बिना पछतावे, बिना शक के, बिना किसी तब्दीली के, हमारे हक़ में या हमारे खिलाफ किसी फ़ितने के बगैर—हमें उसके प्यालों के साथ कौसर का शरबत पिला दे। ऐ अल्लाह, ऐ रब्बुल-आलमीन।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल को अल-वसीला का मक़ाम, फ़ज़ीलत और बुलंद दर्जा अता फ़रमा। उन्हें उनके नबी भाइयों के साथ उस मक़ाम-ए-महमूद तक पहुँचा दे जिसका तूने उनसे वादा किया है। ऐ अल्लाह! इस उम्मत के आका और रहमत के नबी—हमारे आका मुहम्मद पर; हमारे बाप आदम पर, हमारी माँ हव्वा पर; और उनसे पैदा होने वाले नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और सालिहीन पर; ज़मीन और आसमान के तमाम फ़रिश्तों पर; और उनके साथ हम पर भी—दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ रहम करने वालों में सबसे रहम करने वाले!
ऐ अल्लाह! मुझे, मेरे गुनाहों को और मेरे माता-पिता को बख़्श दे। ऐ अल्लाह! मेरे माता-पिता पर रहम फ़रमा, जैसा उन्होंने मुझे बचपन में पाला-पोसा। तमाम मोमिन मर्द और औरतों, तमाम मुसलमान मर्द और औरतों—उनमें से जो मर चुके और जो ज़िंदा हैं—सबके गुनाह माफ़ कर दे। हमारे और उनके बीच एक-दूसरे की ख़बरगीरी, दुश्मनी से बचना, और एक-दूसरे के लिए दुआ करना जैसी भलाइयों में हमारी मदद फ़रमा। मेरे रब! मुझे बख़्श दे और मुझ पर रहम फ़रमा; तू रहम करने वालों में सबसे बेहतर है। क़ुव्वत और ताक़त सिर्फ़ अल्लाह, यक़ीनन बुलंद और अज़ीम, के पास है।
ऐ अल्लाह! नूरों के नूर, रहस्यों के रहस्य; अबरार के मक़ाम में अपनी उम्मत के सबसे सच्चे और सबसे ख़ैर वाले बंदों के आका; शरीफ़ रसूलों की ज़ीनत; जिन पर रात अपनी सियाही डालती है और दिन अपनी रौशनी बिखेरता है, उनमें सबसे करीम—हमारे आका मुहम्मद पर—दुनिया के पहले लम्हे से आख़िरी वक़्त तक गिरने वाली बारिश की बूंदों की गिनती के बराबर, पौधों और हर दरख़्त पर उगने वाली हर चीज़ की गिनती के बराबर; और ऐसी सलात के साथ दरूद नाज़िल फ़रमा जो वाहिद और क़ह्हार अल्लाह की बादशाहत क़ायम रहने तक क़ायम रहे।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर—दुनिया में उनकी रौज़ा-ए-मुतह्हरा के लिए, और आख़िरत में फ़िरदौस-ए-आला में उनके मक़ाम के लिए—ऐसी सलात के साथ दरूद नाज़िल फ़रमा जिससे तू उनके मक़ाम को तरह-तरह के इकरामों के साथ मुअज्ज़ज़ और अज़ीम बनाए, और क़यामत के दिन उन्हें वह चीज़ें पहुँचा दे जिनकी वह आरज़ू करेंगे और जिनसे वह राज़ी होंगे।
ऐ हमारे आका मुहम्मद! यह सलात उस हक़ की ताज़ीम के लिए है जो हम पर वाजिब है। ऐ हमारे आका मुहम्मद! यह सलात उस हक़ की ताज़ीम के लिए है जो हम पर वाजिब है। ऐ हमारे आका मुहम्मद (अल्लाह का दरूद व सलाम उन पर हो)! यह सलात उस हक़ की ताज़ीम के लिए है जो हम पर वाजिब है।
ऐ अल्लाह! हा़ (रहमत), दो मीम (हुक्मरानी) और दाल (तमाम मख़लूक़ का पनाह) जिनसे इशारा किया गया है—म-ह-म-म-द—उस सय्यिद पर, जो हर फ़ज़ीलत के मालिक, कामिल, जिनका नूर सबसे पहले पैदा किया गया, आलमों के लिए रहमत और नुबूवत को तमाम करने वाले हैं—हमारे आका मुहम्मद पर—अपने इल्म में मौजूद चीज़ों की गिनती के बराबर, और जब तक ज़िक्र करने वाले तुझे और उन्हें ज़िक्र करते रहें और गाफ़िल लोग तेरे और उनके ज़िक्र से गाफ़िल रहें, और जब तक तेरी बुलंद ज़ात हमेशा बाक़ी रहे—ऐसी सलात के साथ दरूद नाज़िल फ़रमा जो सिर्फ़ तेरे पर्याप्त समझने के हुक्म के सिवा कभी खत्म न हो। बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है। बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है। बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है।
ऐ अल्लाह! हिदायत के सूरजों में सबसे खूबसूरत और नूर के लिहाज़ से सबसे शरफ़ीले—उम्मी नबी, हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमा। क्योंकि हमारे आका मुहम्मद (अल्लाह का सलाम उन पर हो) अपनी रिसालत की खबरों के लिहाज़ से नबियों में सबसे मशहूर और सबसे ज़्यादा काबिल-ए-हम्द हैं; उनका नूर तमाम नबियों के नूर से ज़्यादा रौशन, ज़्यादा शरफ़ वाला और ज़्यादा साफ़ है; अख़लाक़ के लिहाज़ से वह उनमें सबसे पाक और सबसे बे-आइब हैं; और अपनी ख़िल्क़त के लिहाज़ से वह उनमें सबसे मुकर्रम और सबसे मज़बूत हैं।
ऐ अल्लाह! हमारे आका, उम्मी नबी मुहम्मद पर—जो चौदहवीं के चाँद से भी ज़्यादा खूबसूरत हैं और जिनकी सख़ावत बारिश के बादलों और समुंदरों के पानी की बहुतायत से भी बढ़कर है—और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका, उम्मी नबी मुहम्मद पर—जिनकी ज़ात और ज़िन्दगी बरकत का सरापा है, और जिनके ज़िक्र और खुशबू की रूहानी खूबसूरती हर मख़लूक़ को मस्त कर देती है—और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दरूद और सलाम नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! जैसे तूने हमारे आका इब्राहीम और उनकी आल पर दरूद, रहमत और बरकत अता की, वैसे हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर भी दरूद नाज़िल फ़रमा, रहमत फ़रमा और बरकत अता फ़रमा। निस्संदेह तू हम्द के लायक़, अज़मत और शरफ़ वाला है।
ऐ अल्लाह! अपने बंदे, अपने नबी, अपने रसूल, उम्मी नबी—हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दुनिया और आख़िरत भर दरूद नाज़िल फ़रमा। हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दुनिया और आख़िरत भर बरकत अता फ़रमा। हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दुनिया और आख़िरत भर रहमत अता फ़रमा। हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दुनिया और आख़िरत भर सलाम नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर उसी तरह दरूद नाज़िल फ़रमा जैसा तूने हमें दरूद पढ़ने का हुक्म दिया है। हमारे आका मुहम्मद पर उस सबसे मुनासिब तरीके से दरूद नाज़िल फ़रमा जो दरूद के लिए सबसे ज़्यादा योग्य है।
ऐ अल्लाह! तमाम नबियों में से चुने हुए अपने नबी पर, तमाम बंदों में से जिस रसूल से तू राज़ी है उस पर, हज़रत आदम (अल्लाह का सलाम उन पर हो) से लेकर वजूद के आलम में तशरीफ़ लाने तक, सबसे शरफ़ीली मख़लूक़ में से चुने हुए अपने वली पर, और समावी वह्य के बारे में अपने अमीन पर—हमारे आका मुहम्मद पर—सलात नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर—जिन्हें तूने आराफ़ सूरा में बयान किए गए उस नस्ल से ज़ाहिर फ़रमाया, जो इंसाफ़ और रहमत को क़ायम रखती है; जिन्हें तूने सबसे शरफ़ीले बापों की पाक पीठों से और सबसे पाक व असील माँओं के पाक रहमों से निकाला; अब्दे मनाफ़ के बेटे अब्दुलमुत्तलिब की नस्ल में से चुनकर; जिनके ज़रिये तूने इस्लाम का विरोध करने वालों को हिदायत दी और इफ़्फ़त का रास्ता खोल दिया—उन्हीं पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! तुझसे मांगी जाने वाली चीज़ों में से सबसे अफ़ज़ल चीज़ के वसीले से; तेरे नामों में से तुझे सबसे ज़्यादा प्यारे और सबसे ज़्यादा मुकर्रम नाम के वसीले से; हमारे नबी, हमारे आका मुहम्मद (अल्लाह का सलाम उन पर हो) के वसीले से तूने हमें जो नेमतें अता कीं उनके वसीले से; और उन्हीं के वसीले से तूने हमें गुमराही से बचाया; और इस वजह से कि तूने हमें उन पर सलावत भेजने का हुक्म दिया—और उन पर हमारी सलावत को तूने दुनिया और आख़िरत में हमारे लिए मक़ाम-ए-क़ुबूल बनाया, और अपनी तरफ़ से लुत्फ़ व एहसान के तौर पर हमारे गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया बनाया—हम तेरे हुक्म की ताज़ीम करते हुए, और पूरे दिल से यक़ीन रखते हुए कि तू अपने वादे को पूरा करता है, तुझसे इल्तिजा और दुआ करते हैं। ऐ हमारे रब! जब हमने अहद-ए-अलस्त में उन पर ईमान लाया और उनकी तस्दीक़ की; और जब हमने उस क़ुरआन-ए-करीम की पैरवी की जो तूने उन पर नाज़िल फ़रमाया—और तेरे इस कौल को याद किया कि अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर सलावत भेजते हैं, ऐ ईमान वालों! तुम भी उन पर सलावत भेजो और पूरी सलामती के साथ सलाम भेजो—तूने अपने बंदों पर अपने नबी पर सलावत भेजना फ़र्ज़ किया और उन्हें इसका हुक्म दिया। ऐ हमारे रब! तेरी बुलंद ज़ात की हुरमत के वसीले से, तेरे जलाल के नूर के वसीले से, और उस चीज़ के वसीले से जिसे तूने इहसान के मक़ाम वालों पर वाजिब ठहराया है—हम तुझसे मांगते हैं कि तू अपने बंदे, अपने रसूल, अपने नबी, अपनी मख़लूक़ में सबसे बेहतरीन, उस शान वाले आका हज़रत मुहम्मद पर—अपनी मख़लूक़ में से जिस पर तू दरूद भेजता है, उन सब में से सबसे अफ़ज़ल दरूद के साथ—खुद भी दरूद भेजे और तेरे तमाम फ़रिश्ते भी दरूद भेजें। बेशक तू हम्द के लायक़, अज़मत और शरफ़ वाला है।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद का दर्जा बुलंद कर। उनका मक़ाम ऊँचा कर। क़यामत के दिन उनका मीज़ान भारी कर दे। उनकी हुज्जत को रौशन कर दे, उनके दीन को हमेशा ज़ाहिर रख, उनके अज्र को बहुत बढ़ा दे, और उनके नूर को चमकता हुआ कर दे। दोनों जहानों में उनकी इज़्ज़त को दाइमी कर दे। और उनकी वह नस्ल और वह शरीफ़ अहले-बैत जिन्हें देखकर उनकी आँख ठंडी होती है, उन्हें भी उनके साथ कर दे। और उनसे पहले गुज़रे हुए नबियों में उन्हें अज़मत वाला बना दे।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद को, उनके मानने वालों के लिहाज़ से, नबियों में सबसे बड़ी उम्मत और सबसे ज़्यादा वज़ीर (सहायक) वाला नबी बना; उनका नूर और उनका रुतबा तमाम नबियों से बढ़कर कर; उनका दर्जा नबियों में सबसे ऊँचा कर; और जन्नत में उनका मक़ाम सबसे वसीअ और सबसे फैलाव वाला बना दे।
ऐ अल्लाह! उन्हें सबक़त ले जाने वालों में से बना; उनका दर्जा खास चुने हुए लोगों में से कर; उनका मक़ाम अपने खालिस बंदों में से चुने गए लोगों में रख; और उनका ठिकाना मुक़र्रबून के मक़ाम में, तेरे क़रीब रहने वालों के साथ कर दे।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद को अपने हज़ूर में—दर्जा के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा करीम, सवाब के लिहाज़ से सबसे अफ़ज़ल, तेरे दरबार में सबसे क़रीब, मक़ाम में सबसे ज़्यादा मज़बूती से क़ायम, बात में सबसे सच्चे, दुआ/मुराद के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा कबूल किए जाने वाले, और अपने क़रीब रहने वालों में सबसे ज़्यादा पसन्दीदा बना दे। और उन्हें फ़िरदौस-ए-आला के बाग़ों के महलों में वहाँ ठहरा दे जहाँ उनके ऊपर कोई दर्जा न हो।
ऐ अल्लाह! हमारे आका हज़रत मुहम्मद को सबसे सच्चा बोलने वाला बना, जिसकी दुआ सबसे जल्दी कबूल हो; उन्हें पहला शफ़ाअत करने वाला बना—और उनकी शफ़ाअत को कबूल फ़रमा—ताकि जब तू अपने बंदों को जन्नत वालों और जहन्नम वालों में अलग करने का फैसला करे, तो वह बोलने वालों में सबसे सच्चे, हिदायत पाने वालों में सबसे ज़्यादा यक़ीन वाले, और नबियों में अमल-ए-ख़ैर करने वालों में सबसे बेहतरीन हों।
ऐ अल्लाह! हमारे नबी को हमारे लिए ऐसा पेशवा बना दे जो अपने बाद आने वाली अपनी उम्मत के लिए वसीले और इमकानात तैयार करे; और उनके हौज़-ए-कौसर को हमारे पहले पहुँचने वालों और बाद में पहुँचने वालों के लिए मुलाक़ात की जगह बना दे।
ऐ अल्लाह! हमें उनकी जमाअत में हश्र कर। उनकी सुन्नत पर अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। हमें उनके दीन पर मौत दे। हमें उनका नूरानी, करीम चेहरा दिखा दे। हमें उनकी जमाअत और उनके ताबेईन में शामिल कर दे।
ऐ अल्लाह! हमने उन्हें देखे बगैर उन पर ईमान लाया; हमें उनसे मिला दे। जब तक तू हमें उनके हौज़-ए-कौसर तक न पहुँचा दे, और जहाँ-जहाँ वह दाख़िल हों, वहाँ हमें भी दाख़िल न कर दे—तब तक उनके और हमारे बीच जुदाई न करना। हमें उन लोगों में से बना जिन पर तूने नेमतें कीं: नबी, सिद्दीक़, शहीद, और उनके नेक सहाबी। वे कितने अच्छे साथी हैं। तमाम हम्द अल्लाह, रब्बुल-आलमीन, के लिए है।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद (अल्लाह का सलाम उन पर हो) हिदायत का नूर हैं, ख़ैर की तरफ़ बुलाने वाले हैं, दोनों जहानों की सआदत की तरफ़ दावत देने वाले हैं, रहमत के नबी हैं, मुत्तक़ियों के इमाम हैं; जिनके बाद कभी कोई नबी नहीं आएगा—वह अल्लाह के रसूल हैं, रब्बुल-आलमीन के रसूल हैं। हमारे आका मुहम्मद (अल्लाह का सलाम उन पर हो) ने अपनी रिसालत को पहुँचा दिया, बंदों को नसीहत की, उन्हें तेरी आयतें पढ़कर सुनाईं, हराम काम करने वालों के लिए शरई मापदंड के तौर पर हुदूद (हदें) क़ायम कीं, तेरे अहकाम نافिज़ किए, तुझे मानने का हुक्म दिया, तेरी नाफ़रमानी से मना किया, जिनसे दोस्ती करने का तूने हुक्म दिया उनसे दोस्ती रखी, और जिनसे दुश्मनी रखने का तूने हुक्म दिया उनसे दुश्मनी रखी। इसलिए हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! जिस्मों में हमारे नबी मुहम्मद के जिस्म पर, रूहों में हमारे नबी मुहम्मद की रूह पर, ठहरने की जगहों में उनके ठहरने के मक़ाम पर, क़ब्रों में उनकी मुबारक क़ब्र पर, और जब उनका ज़िक्र किया जाए तो उनके ज़िक्र पर—हमारी तरफ़ से हमारे नबी मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! जैसा तेरी बुलंद ज़ात के शान के मुताबिक है, हमारी तरफ़ से उन तक सलाम, रहमत और बरकत पहुँचा दे।
ऐ अल्लाह! मुक़र्रबून के मक़ाम वाले फ़रिश्तों पर, हर ऐब से पाक तेरे नबियों पर, तेरी इलाही किताब के साथ भेजे गए तेरे रसूलों पर, अर्श उठाने वाले फ़रिश्तों पर; हमारे आका जिब्रील, मीकाईल, इसराफ़ील, अज़्राईल पर; जन्नत के दरबान रिद्वान पर और जहन्नम के दरबान मालिक पर; दाएँ और बाएँ रहने वाले नेक और बुरे आमाल लिखने वाले किरामन कातिबीन पर; और ज़मीन व आसमान के तमाम उन लोगों पर जो तेरी इताअत करते हैं—दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! रसूलों के अहले-बैत में से किसी को तूने जो कुछ अता किया है, उससे भी बढ़कर अपने नबी के अहले-बैत को अता फ़रमा। और रसूलों के सहाबा में से किसी को तूने जिस बदले से नवाज़ा है, उससे भी अफ़ज़ल बदला हमारे नबी के सहाबा को अता फ़रमा।
ऐ अल्लाह! मोमिन मर्दों और औरतों को, मुसलमान मर्दों और औरतों को—उनमें से जो मर चुके और जो ज़िंदा हैं—सबको बख़्श दे। 'ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन दीन भाइयों को बख़्श दे जो ईमान में हमसे पहले गुज़र गए; और हमारे दिलों में ईमान वालों के लिए कोई किनाह और बैर न रहने दे। ऐ हमारे रब! बेशक तू बहुत शफ़ीक़, बहुत रहम करने वाला है।'
ऐ अल्लाह! हाशिमी नस्ल के हमारे आका मुहम्मद नबी पर, उनकी आल पर और उनके सहाबा पर दरूद नाज़िल फ़रमा; और उन पर पूरी तरह सलाम नाज़िल फ़रमा।
ऐ रहम करने वालों में सबसे रहम करने वाले! ऐसी सलात के साथ हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा जो तुझे भी राज़ी करे, उन्हें भी राज़ी करे, और जिससे तू हमसे भी ख़ुश हो जाए—जो इंसानियत में सबसे बेहतरीन हैं।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर, उनकी आल पर और उनके सहाबा पर बहुत ज़्यादा, खूबसूरत और मुकम्मल दरूद व सलाम नाज़िल फ़रमा—ऐसा जो हर तरफ़ खुशबू फैलाए, जिसमें बरकतें हों, और जो अल्लाह की बादशाहत क़ायम रहने तक क़ायम रहे।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर फज़ा भर दरूद नाज़िल फ़रमा, और आसमान के सितारों की गिनती के बराबर; और आज तक तूने जितनी मख़लूक़ पैदा की है और क़यामत तक जितनी पैदा करेगा, उस सब के मिक़दार के बराबर—ऐसा दरूद नाज़िल फ़रमा जो आसमान और ज़मीन को संतुलन में रखे।
ऐ अल्लाह! जैसे तूने हमारे आका इब्राहीम पर दरूद नाज़िल फ़रमाया, वैसे हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर भी दरूद नाज़िल फ़रमा। और तमाम आलमों में जैसे तूने हमारे आका इब्राहीम और उनकी आल पर बरकत अता की, वैसे हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर भी बरकत अता फ़रमा। बेशक तू हम्द के लायक़, अज़मत और शरफ़ वाला है।
ऐ अल्लाह! मैं अपने दीन, अपनी दुनिया और अपनी आख़िरत के कामों में—हर गुनाह से मग़फ़िरत और हर आफ़त व ग़म से सलामती चाहता हूँ।
ऐ अल्लाह! अपने बुलंद करम के साथ हमारे गुनाहों, ऐबों और नाफ़रमानियों पर पर्दा डाल। ऐ अल्लाह! अपने बुलंद करम के साथ हमारे गुनाहों, ऐबों और नाफ़रमानियों पर पर्दा डाल। ऐ अल्लाह! अपने बुलंद करम के साथ हमारे गुनाहों, ऐबों और नाफ़रमानियों पर पर्दा डाल।
ऐ अल्लाह! तेरे सबसे बुलंद हक़ और तेरे नूर-ए-जमाल के वसीले से; तेरे अर्श-ए-अज़ीम के वसीले से; तेरी अज़मत, जलाल, जमाल, क़ुदरत, क़ुव्वत और ताक़त के वसीले से; तेरे अर्श को उठाए रखने वाली कुर्सी के हक़ के वसीले से; और रहस्यों के ख़ज़ानों में मौजूद उन नामों की हुरमत के वसीले से जिन्हें तेरी मख़लूक़ में से कोई नहीं जानता—ऐ मेरे रब! मैं तुझसे मांगता हूँ।
ऐ अल्लाह! उस नाम की हुरमत के वसीले से—जिसे रात पर रखा जाए तो वह रात को अंधेरा कर दे, और दिन की रौशनी पर रखा जाए तो दिन को रौशन कर दे; जिसे आसमान पर रखा जाए तो उसे बिना स्तंभों के थामे रखे; जिसे ज़मीन पर रखा जाए तो उसे मज़बूत कर दे; जिसे पहाड़ों पर रखा जाए तो पहाड़ों को अपनी जगह जमा दे; जिसे समुंदरों और वादियों पर लिख दिया जाए तो पानी को बहाकर ले चले और चश्मों को जोश में ले आए; और जिसे बादलों पर रखा जाए तो बारिश बरसा दे—ऐ मेरे रब! मैं तुझसे मांगता हूँ।
ऐ अल्लाह! हमारे आका इसराफ़ील (अलैहिस्सलाम) के माथे पर लिखे हुए नामों के वसीले से, और हमारे आका जिब्रील (अलैहिस्सलाम) के माथे पर लिखे हुए नामों के वसीले से; और मुक़र्रबून के मक़ाम वाले फ़रिश्तों पर लिखे हुए नामों की हुरमत के वसीले से—मैं तुझसे मांगता हूँ।
ऐ अल्लाह! अर्श के चारों तरफ़ लिखे हुए नामों के वसीले से, और कुर्सी के इर्द-गिर्द लिखे हुए नामों के वसीले से—मैं तुझसे मांगता हूँ।
ऐ अल्लाह! ज़ैतून के पत्ते पर लिखे हुए इस्म-ए-आज़म के वसीले से, मैं तुझसे मांगता हूँ।
ऐ अल्लाह! तेरे उन बुलंद नामों के वसीले से जिनसे तूने अपनी ज़ात को नाम दिया—जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्हें नहीं जानता—मैं तुझसे मांगता हूँ।