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अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील, विशेष दयालु है। अल्लाह तआला हमारे आका मुहम्मद, उनकी आल और उनके सहाबा पर दरूद व सलाम नाज़िल फ़रमाए। ऐ अल्लाह! तेरे नबी, हमारे आका मुहम्मद (उन पर शांति हो) की उस प्रतिष्ठा के वसीले से जो उनके लिए तेरे पास है, और उस मुहब्बत के वसीले से जो तू उनसे करता है और वे तुझसे करते हैं, और उस रहस्य के वसीले से जो तेरे और उनके बीच है, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू उन पर, उनकी आल और उनके सहाबा पर दरूद व सलाम नाज़िल फ़रमा। मेरे दिल में उनकी मुहब्बत को कई गुना बढ़ा दे। उनके सदक़े और उनके ऊँचे मक़ामात के वसीले से मुझे उनकी सच्ची पहचान अता कर। उनके तरीक़े पर चलने, उनके अदब और उनकी सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। इस पर मुझे दृढ़ता प्रदान कर। मुझे इज़्ज़त दे कि मैं रसूल (उन पर शांति हो) का दीदार कर सकूँ। मुझे खुश कर कि मैं उनसे हमकलाम हो सकूँ। मुश्किलों, रुकावटों, वसीलों और पर्दों को दूर कर दे। मेरे कानों को उनके मीठे ख़िताब से हिस्सा दे। ऐ अल्लाह! मुझे रसूल (उन पर शांति हो) के इल्म और मारिफ़त से लाभ उठाने की इजाज़त दे… उन पर मेरी सलात को ऐसा मुकम्मल, पाक, चमकदार नूर बना दे जो हर ज़ुल्म, अंधेरा, शक, शिर्क, कुफ्र, बातिल और गुनाह को मिटा दे। और उस सलात को मेरे तज़किये का कारण बना दे। इन बरकतों के ज़रिये मुझे इख़लास के मक़ाम की बुलंदी तक पहुँचा दे, ताकि मेरे भीतर कोई संदेह न रहे कि इबादत केवल तेरे सिवा किसी और के लिए नहीं। इस तरह मुझे अपने हुज़ूर का योग्य बना और मुझे अपने क़रीबी दोस्तों में शामिल कर। मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं यह सब करते हुए हमेशा रसूल (उन पर शांति हो) के अदब और सुन्नत को मज़बूती से थामे रहूँ और उनकी नूरानी शख़्सियत से मदद चाहता रहूँ। ऐ अल्लाह! ऐ नूर! ऐ हक़! ऐ ज़ाहिर! ऐ अल्लाह! ऐ नूर! ऐ हक़! ऐ ज़ाहिर! ऐ अल्लाह! ऐ नूर! ऐ हक़! ऐ ज़ाहिर!
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमा। हमारे आका मुहम्मद को al-Wasīla, ऊँचा दर्जा और फ़ज़ीलत अता फ़रमा, और उन्हें उस प्रशंसनीय मक़ाम Al-Maqām al-Maḥmūd तक पहुँचा दे जिसका तूने वादा किया है। बेशक तू वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता।
ऐ अर्श-ए-अज़ीम के रब! ऐ अल्लाह, ऐ रब्बुल-आलमीन! हमारे आका मुहम्मद की शान को बुलंद फ़रमा, उनके दीन को ज़ाहिर फ़रमा, और उनकी नुबूव्वत की दलीलों को रौशन कर दे। उनकी फ़ज़ीलत को ज़ाहिर कर दे, उनकी उम्मत के बारे में उनकी शफ़ाअत को कबूल फ़रमा, और हमें उनकी सुन्नत पर अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।
हमें उनके झंडे के नीचे उनकी जमाअत के साथ हश्र फ़रमा। उनके प्याले के साथ हमें कौसर का शरबत पिला। उनकी मुहब्बत से हमें फ़ायदा पहुँचा। ऐ अल्लाह, ऐ रब्बुल-आलमीन!
ऐ हमारे रब! हमारी तरफ़ से उन तक सलाम का सबसे अफ़ज़ल सलाम पहुँचा दे। उनकी उम्मत की तरफ़ से उन पर अपना फ़ज़्ल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! ऐ हमारे रब! मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मुझे बख़्श दे, मुझ पर रहम फ़रमा, मेरी तौबा कबूल फ़रमा, और आसमान से उतरने वाली या ज़मीन से निकलने वाली हर बला से मुझे आफ़ियत अता फ़रमा। तू अपनी रहमत से हर चीज़ पर क़ादिर है। ऐ हमारे रब! अपनी रहमत के वसीले से मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू तमाम मोमिन मर्दों और औरतों, तमाम मुसलमान मर्दों और औरतों—उनमें से जो ज़िंदा हैं और जो मर चुके हैं—सबको माफ़ फ़रमा। अल्लाह तआला मोमिनों की पाक माताओं—हमारे नबी की अज़्वाज-ए-मुतहहरात—से, दुनिया के चिराग़—हिदायत के इमाम और राह दिखाने वाले आलिमों—से, उनके सहाबा से, और उनके बाद आने वाले ताबिईन से, और क़यामत के दिन तक भलाई के साथ उनकी पैरवी करने वालों से राज़ी हो। तमाम हम्द अल्लाह, रब्बुल-आलमीन के लिए है। (तीसरे तिहाई की शुरुआत)
ऐ रूहों और सड़ चुके जिस्मों के रब! मैं तुझसे उन रूहों की इताअत के वसीले से मांगता हूँ जो अपने जिस्मों की तरफ़ लौटती हैं, और उन जिस्मों की इताअत के वसीले से जो अपनी रगों से जुड़ जाते हैं। तमाम मख़लूक़ तेरे सामने तेरी रहमत की उम्मीद रखती है, तेरे अज़ाब से डरती है, और तेरे हुक्म की मुंतज़िर है। तेरे उन कलिमात के वसीले से जो हर रूह और हर जिस्म पर जारी होते हैं, और उस हक़ के वसीले से जो तू उनसे वसूल करता है—मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मुझे मेरी निगाह में नूर अता फ़रमा ताकि मैं हक़ को देख सकूँ; मेरे ज़बान पर रात-दिन अपना ज़िक्र जारी रख; और मुझे नेक अमल अता फ़रमा। ऐ मेरे रब! मुझे इन्हीं से रोज़ी दे।
ऐ अल्लाह! जैसे तूने हमारे आका इब्राहीम पर दरूद भेजा, वैसे ही हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा; और जैसे तूने उन पर बरकत अता की, वैसे ही उन पर बरकत अता फ़रमा।
ऐ अल्लाह! जैसे तूने हमारे आका इब्राहीम और उनकी आल पर दरूद व बरकतें नाज़िल फ़रमाईं, वैसे ही हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर भी दरूद व बरकतें नाज़िल फ़रमा। बेशक तू हम्द के लायक़, अज़मत और शरफ़ वाला है। ऐ अल्लाह! जैसे तूने हमारे आका इब्राहीम की आल पर बरकत अता की, वैसे ही हमारे आका मुहम्मद की आल पर भी बरकत अता फ़रमा। बेशक तू हम्द के लायक़, अज़मत और शरफ़ वाला है।
ऐ अल्लाह! अपने बंदे और रसूल, हमारे आका मुहम्मद पर, और तमाम मोमिन मर्दों और औरतों, तमाम मुसलमान मर्दों और औरतों पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर उतनी गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा जितनी तेरे इल्म ने घेर रखी है, जितनी तेरी किताब ने ठहराई है, और जितनी तेरे फ़रिश्तों ने गवाही दी है—ऐसा दरूद जो तेरे मुल्क के बाक़ी रहने तक बाक़ी रहे।
ऐ अल्लाह! तेरे बुलंद नामों के वसीले से—जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्हें नहीं जानता—और उन नामों के वसीले से जिनसे तूने अपनी ज़ात को नाम दिया, मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू अपने बंदे, अपने नबी, हमारे आका मुहम्मद पर उस गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा जिसे तेरे सिवा कोई नहीं जानता—उससे पहले कि आसमान बनाए जाएँ, ज़मीन बिछाई जाए, पहाड़ जमा दिए जाएँ, चश्मे फूटें, नदियाँ बहें, सूरज निकले, चाँद रौशन हो, सितारे चमकें, समुंदर लहराएँ, और दरख़्त फल दें।
ऐ अल्लाह! तेरे इल्म की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरे हिल्म की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरे न खत्म होने वाले कलिमात की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरी नेमतों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरे फ़ज़्ल के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरी सख़ावत की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! आसमानों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! ज़मीन के भरपूर के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! सातों आसमानों में तूने जितने फ़रिश्ते पैदा किए हैं, उनकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! ज़मीन पर जिन्न, इंसान, जंगली जानवर, परिंदे और दूसरी जितनी मख़लूक़ तूने पैदा की है, उनकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! ग़ैब के इल्म में, लौह-ए-महफ़ूज़ में क़दर के बारे में क़लम ने जो लिखा है और क़यामत के दिन तक जो लिखेगा, उसकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! बारिश की बूंदों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जो लोग तेरी हम्द करते हैं, तेरा शुक्र अदा करते हैं, 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहकर तेरी वहदानियत बयान करते हैं, 'इन्नका हमीदुम मजीद' कहकर तेरी तम्जीद करते हैं, और गवाही देते हैं कि तू अल्लाह है—उनकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जितनी सलात तू उन पर भेजता है और जितनी तेरे फ़रिश्ते उन पर भेजते हैं, उसके बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरी मख़लूक़ में से जो लोग उन पर दरूद भेजते हैं, उनकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जो लोग उन पर दरूद नहीं पढ़ते, उनकी गिनती के बराबर उन पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! पहाड़ों, रेत और कंकड़ों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! दरख़्तों और उनके पत्तों की गिनती के बराबर, सूखी मिट्टी और तमाम वज़नों की गिनती के बराबर, हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! हर साल जितनी मख़लूक़ तू पैदा करेगा और जितनी उसमें मरेंगी, उनकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! हर दिन जितनी मख़लूक़ तू पैदा करेगा और जितनी उसमें मरेंगी, उनकी गिनती के बराबर—क़यामत के दिन तक—हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! आसमान और ज़मीन के बीच चलने वाले बादलों से जो पानी बरसता है, उसकी मात्रा के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! ज़मीन और आसमान के अफ़ाक़ में—पूरब, पश्चिम, क़िबला की तरफ़ और उनकी गहराइयों में—चलने वाली हवाओं की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! आसमान के तारों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! समुंदरों में तूने जितनी मछलियाँ, जानदार, पानी, रेत और इनके सिवा दूसरी मख़लूक़ पैदा की है, उनकी गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! पौधों और कंकड़ों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! चींटियों की गिनती के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! मीठे और खारे पानी की मात्रा के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! तूने अपनी सारी मख़लूक़ को जितनी नेमतें अता की हैं, उनकी मात्रा के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जिन लोगों ने तुझे झुठलाया, उन्हें तूने जितना अज़ाब और सज़ा दी, उसकी मात्रा के बराबर हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जब तक दुनिया और आख़िरत बाक़ी रहें, हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जब तक जन्नत बाक़ी रहे, हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जब तक जहन्नम बाक़ी रहे, हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जितना तू हमारे आका मुहम्मद से मुहब्बत करता है और उनसे राज़ी है, उतना ही उन पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! जब तक हमारे आका मुहम्मद तुझसे मुहब्बत करते हैं और तुझसे राज़ी रहते हैं, उन पर दरूद नाज़िल फ़रमा। ऐ अल्लाह! हमेशा के लिए, कभी खत्म न होने वाला दरूद हमारे आका मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा। उन्हें अपने पास सबसे क़रीब मक़ाम में ठहरा दे। उन्हें जन्नत में al-Wasīla, फ़ज़ीलत, शफ़ाअत, ऊँचा दर्जा, और वह प्रशंसनीय मक़ाम Al-Maqām al-Maḥmūd अता फ़रमा जिसका तूने वादा किया है। बेशक तू वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता।
ऐ अल्लाह! बेशक तू मेरी दुनिया और आख़िरत के मामलों में मेरा मालिक और सरपरस्त है; हर हाल में मेरी पनाह, मेरा भरोसा, वही जिसके हवाले मैं अपने तमाम काम करता हूँ; और वही जिस पर मैं उम्मीद रखता हूँ और अपनी ज़रूरतें व आरज़ुएँ पेश करता हूँ। पाक महीने, हरम शहर, मशअर-ए-हरम, और हमारे नबी की क़ब्र-ए-शरीफ़ की हुरमत के वसीले से मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मुझे वह भलाई अता फ़रमा जिसकी हक़ीक़त सिर्फ़ तेरी बुलंद ज़ात जानती है, और मुझे उस बुराई से बचा जिसकी हक़ीक़त सिर्फ़ तेरी बुलंद ज़ात जानती है।
ऐ अल्लाह! तूने हमारे आका आदम को बख़्शा; हमारे आका शीत को अता फ़रमाया; हमारे आका इब्राहीम को उनके बेटे हमारे आका इस्माईल और हमारे आका इसहाक़ अता फ़रमाए; हमारे आका यूसुफ़ को हमारे आका याक़ूब से मिला दिया; हमारे आका मूसा को उनकी माँ तक पहुँचा दिया; हमारे आका ख़िज़्र को इल्म में बढ़ा दिया; हमारे आका दाऊद को उनके बेटे हमारे आका सुलेमान अता फ़रमाए; हमारे आका ज़करिया को उनके बेटे हमारे आका याह्या अता फ़रमाए; हमारी माँ मरयम को उनके बेटे हमारे आका ईसा अता फ़रमाए; और हमारे आका शुऐब की बेटी को हमारे आका मूसा से मुलाक़ात करा कर उसकी हिफाज़त फ़रमाई—उन सब पर सलाम हो। ऐ अल्लाह, ऐ हमारे रब! मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद पर और तमाम नबियों व रसूलों पर दरूद नाज़िल फ़रमा, और उन्हें शफ़ाअत और सबसे ऊँचा दर्जा अता फ़रमा। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मेरे गुनाह बख़्श दे, मेरे तमाम ऐब ढाँप दे, मुझे जहन्नम की आग से बचा, मुझे अपनी रज़ा, अमन, माफ़ी और करम अता फ़रमा, और जिन नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और सालेहों पर तूने इनाम किया है—उनके साथ मुझे अपनी जन्नत में नेमत अता फ़रमा। बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है।
अल्लाह हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर दरूद नाज़िल फ़रमाए—जब तक हवाएँ जमा हुए बादलों को चलाती रहें और हर जान मौत का मज़ा चखे। ऐ अल्लाह! दारुस-सलाम के रहने वालों तक सलाम पहुँचा दे।
ऐ अल्लाह! मुझे उस काम में लगा दे जिसके लिए तूने मुझे पैदा किया। जिस रोज़ी की ज़िम्मेदारी तूने मेरे लिए ले रखी है, उसके ख़याल में मेरे दिल को न उलझा। तूने मेरे लिए रोज़ी देना अपने ऊपर ले लिया है, तो जब मैं तुझसे मांगूँ मुझे महरूम न कर, और जब मैं तुझसे मग़फ़िरत चाहूँ तो मुझे सज़ा न दे। ऐ अल्लाह! मुझे उस काम में लगा दे जिसके लिए तूने मुझे पैदा किया। जिस रोज़ी की ज़िम्मेदारी तूने मेरे लिए ले रखी है, उसके ख़याल में मेरे दिल को न उलझा। तूने मेरे लिए रोज़ी देना अपने ऊपर ले लिया है, तो जब मैं तुझसे मांगूँ मुझे महरूम न कर, और जब मैं तुझसे मग़फ़िरत चाहूँ तो मुझे सज़ा न दे। ऐ अल्लाह! मुझे उस काम में लगा दे जिसके लिए तूने मुझे पैदा किया। जिस रोज़ी की ज़िम्मेदारी तूने मेरे लिए ले रखी है, उसके ख़याल में मेरे दिल को न उलझा। तूने मेरे लिए रोज़ी देना अपने ऊपर ले लिया है, तो जब मैं तुझसे मांगूँ मुझे महरूम न कर, और जब मैं तुझसे मग़फ़िरत चाहूँ तो मुझे सज़ा न दे।
ऐ अल्लाह! हमारे आका मुहम्मद पर और उनकी आल पर दरूद और सलाम नाज़िल फ़रमा।
ऐ अल्लाह! तेरे हबीब मुहम्मद मुस्तफ़ा की हुरमत के वसीले से हम तेरी तरफ़ रुजू करते हैं और तुझसे मुहब्बत करते हैं। ऐ हमारे आका मुहम्मद! हम आपके वसीले से आपके रब की क़ुर्बत मांगते हैं। ऐ पाक और ख़ूबसूरत रसूल! मवला-ए-करीम के पास हमारे लिए शफ़ाअत फ़रमा।
ऐ अल्लाह! तेरे पास उनके मक़ाम की हुरमत के वसीले से, उन्हें हमारे लिए शफ़ीअ बना दे। ऐ अल्लाह! तेरे पास उनके मक़ाम की हुरमत के वसीले से, उन्हें हमारे लिए शफ़ीअ बना दे। ऐ अल्लाह! तेरे पास उनके मक़ाम की हुरमत के वसीले से, उन्हें हमारे लिए शफ़ीअ बना दे।
ऐ अल्लाह! हमें उन लोगों में से बना दे जो हमारे नबी पर दरूद व सलाम भेजने वालों में सबसे बेहतरीन हैं; और हमें उनके सबसे क़रीब लोगों में से बना दे; और उन लोगों में से बना दे जो उनसे मुलाक़ात करेंगे। हमें उनके मुहिब्बों में शामिल कर दे, और उन लोगों में से बना दे जो उनके नज़दीक सबसे प्यारे हैं। क़यामत के दिन (हश्र के दिन) हमें उनके साथ खुश कर दे।
उन्हें हमारे लिए जन्नत-ए-नइम में रहनुमा बना दे ताकि हम बिना तकलीफ़, मशक़्क़त और हिसाब के जन्नत में दाख़िल हों। हमें उन की तरफ़ से राज़ी कर के हमारी ओर उनका रुख़ कर दे जबकि हम उनकी शफ़ाअत की उम्मीद रखते हैं; और उन्हें हमसे नाराज़ न कर।
ऐ अल्लाह! हमें, हमारे माता-पिता को, और तमाम मुसलमानों को—उनमें से जो ज़िंदा हैं और जो मर चुके हैं—बख़्श दे। हमारी आख़िरी दुआ यह है: तमाम हम्द अल्लाह, रब्बुल-आलमीन के लिए है। (चौथे चौथाई की शुरुआत)
मैं तुझसे मांगता हूँ। ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ हय्यू! ऐ क़य्यूम! ऐ ज़ुल-जलाल वल-इकराम! तेरे सिवा कोई माबूद नहीं; तू पाक है। मैं तेरे अज़ीम अहकाम का हक़ अदा नहीं कर सका और मैं ज़ालिमों में से हो गया।
ऐ अल्लाह! कुर्सी और उसमें तेरी अज़मत, जलाल, इज़्ज़त, क़ुदरत और सल्तनत में से जो कुछ है, उसके हक़ के वसीले से; और तेरे उन पाक, छिपे हुए नामों की हुरमत के वसीले से जिन्हें तेरी मख़लूक़ में से कोई नहीं जानता; और तेरे उस नाम के वसीले से जिसे तू रात पर रखे तो रात अंधेरी हो जाए, दिन पर रखे तो दिन रौशन हो जाए; आसमानों पर रखे तो वे बिना स्तंभों के ठहर जाएँ; ज़मीन पर रखे तो वह स्थिर हो जाए; समुंदरों पर रखे तो उनके पानी उमड़कर बह निकले; चश्मों पर रखे तो वे फूट पड़ें; और बादलों पर रखे तो वे बारिश बरसा दें—मैं तुझसे मांगता हूँ।
मैं तुझसे हमारे आका जिब्रील के माथे पर लिखे नामों के वसीले से, हमारे आका इसराफ़ील के माथे पर लिखे नामों के वसीले से, और तमाम फ़रिश्तों पर लिखे नामों के वसीले से मांगता हूँ।
अर्श और कुर्सी के चारों ओर लिखे हुए नामों के वसीले से मैं तुझसे मांगता हूँ।
तेरे उस सर्वोच्च नाम के वसीले से जिससे तूने अपनी ही बुलंद ज़ात को नाम दिया, मैं तुझसे मांगता हूँ।
तेरे तमाम नामों के वसीले से—जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्हें नहीं जानता।
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे उन नामों के वसीले से मांगता हूँ जिनसे हमारे आका आदम ने तुझसे दुआ की, और उन नामों के वसीले से जिनसे हमारे आका नूह ने तुझसे दुआ की। मैं तुझसे उन नामों के वसीले से मांगता हूँ जिनसे हमारे आका सालेह ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका यूनुस ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका मूसा ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका हारून ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका शुऐब ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका इब्राहीम ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका इस्माईल ने तुझसे दुआ की; और जिनसे हमारे आका दाऊद ने तुझसे दुआ की। मैं तुझसे उन नामों के वसीले से मांगता हूँ जिनसे हमारे आका सुलेमान ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका ज़करिया ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका यूशा ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका ख़िज़्र ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका इलियास ने तुझसे दुआ की; जिनसे हमारे आका अल-यसा ने तुझसे दुआ की; और जिनसे हमारे आका ज़ुल-किफ़्ल ने तुझसे दुआ की। मैं तुझसे उन नामों के वसीले से मांगता हूँ जिनसे हमारे आका ईसा ने तुझसे दुआ की; और उन नामों के वसीले से जिनसे तेरे नबी, तेरे रसूल, तेरे हबीब—जिसे तूने इंसानों में से चुना—हमारे आका मुहम्मद ने तुझसे दुआ की। ऐ वह जिसकी बात सच्ची है, जिसने फ़रमाया: “अल्लाह ने तुम्हें और जो तुम करते हो उसे पैदा किया।” तेरे किसी बंदे से कोई बात, कोई अमल, कोई हरकत या कोई सुकून नहीं होता, मगर वह उसी तरह वाक़े होता है जैसा तेरे इल्म, क़ज़ा और क़दर में है।
ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मुझे और हर उस शख़्स को जो हमारे नबी की पैरवी करता है और उनसे मुहब्बत रखता है, हिसाब के दिन उनकी शफ़ाअत और उनकी संगत से रोज़ी दे—बिना कुसूरों की जांच किए, बिना अज़ाब, बिना डाँट-फटकार, और बिना रद्द या तिरस्कार के। ऐ वह्हाब! ऐ ग़फ़्फ़ार! मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे ऐब छिपा दे। जिस दिन बिना हिसाब सवाब और इनाम दिए जाएँगे, मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू तमाम अज़ीज़ दोस्तों के बीच मुझे अपने बुलंद जमाल के दीदार की नेमत अता फ़रमा, मेरे अमल कबूल फ़रमा, और मेरी तमाम ख़ताओं को माफ़ फ़रमा—जो मैंने जान-बूझकर, अनजाने में, या गलती से कीं—जिन्हें तू अपने अज़ली इल्म से जानता है। मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मेरी सबसे बड़ी आरज़ू पूरी कर दे: अपने फ़ज़्ल, इनायत, सख़ावत और करम से मुझे हमारे नबी की क़ब्र की ज़ियारत तक पहुँचा दे, और मुझे उन पर और उनके दो साथियों पर सलाम भेजने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। ऐ रऊफ़! ऐ रहीम! ऐ वली! मैं अपनी तरफ़ से और तमाम मोमिन मर्दों और औरतों, तमाम मुसलमान मर्दों और औरतों, उनके घरानों, उनके ज़िंदों और उनकी औलाद की तरफ़ से तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद को अपनी मख़लूक़ में से जिस किसी को तू जो बदला देता है, उनमें से सबसे ज़्यादा, सबसे अफ़ज़ल और सबसे व्यापक बदला अता फ़रमा। ऐ क़वी! ऐ अज़ीज़! ऐ अलीम!
ऐ अल्लाह! तेरी बुलंद ज़ात की अज़मत पर जिन चीज़ों की मैंने क़सम खाई है—उससे पहले कि आसमान बनाए जाएँ, ज़मीन बिछाई जाए, पहाड़ उठाए जाएँ, चश्मे फूट पड़ें, समुंदर ठहर जाएँ, नदियाँ उमड़ें, सूरज निकले, चाँद रौशन हो, और सितारे अंधेरों को नूर दें—उनके वसीले से मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर ऐसा दरूद नाज़िल फ़रमा जिसे तेरे सिवा कोई न जानता हो।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर अपने कलिमात की गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर क़ुरआन की आयतों और उसके हरफ़ों की गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर उन लोगों की गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा जो उन पर दरूद पढ़ते हैं।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर उन लोगों की गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा जो उन पर दरूद नहीं पढ़ते।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर ज़मीन भर के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर लौह-ए-महफ़ूज़ में क़दर के बारे में क़लम ने जो लिखा है, उसके बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर सातों आसमानों में जितनी मख़लूक़ तूने पैदा की है, उनकी गिनती के बराबर दरूद नाज़िल फ़रमा।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर क़यामत के दिन तक जितनी मख़लूक़ तू पैदा करेगा, उसके बराबर—हर रोज़ हज़ार बार—दरूद नाज़िल फ़रमा।
मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू हमारे आका मुहम्मद और उनकी आल पर जिस दिन से तूने दुनिया को पैदा किया है क़यामत के दिन तक, आसमान से ज़मीन पर गिरने वाली बारिश की बूंदों की गिनती के बराबर—हर रोज़ हज़ार बार—दरूद नाज़िल फ़रमा।